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kabir das ji ke dohe in hindi with meaning
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1. गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय।।
भावार्थ – इस संसार में गुरु ही ईश्वर प्राप्ति का एकमात्र सहारा है। इसलिए हमें जब ईश्वर और गुरु दोनों में से किसी एक के चरण स्पर्श करने को कहा जाए तो हमें सबसे पहले गुरु के चरण स्पर्श करने चाहिए क्योंकि गुरु के आशीर्वाद से ही हमें ईश्वर की प्राप्ति होती है।
2. काहैं कबीर देय तू, जब लग तेरी देह।
देह खेह होय जायगी, कौन कहेगा देह।।
भावार्थ – कबीरदास जी कहते है कि जब तक मनुष्य के शरीर में आत्मा का वास है उसे तब तक अच्छे कार्य करते रहना चाहिए। एक बार जब मनुष्य के शरीर से आत्मा निकल जाती है तो उसका शरीर मिट्ठी का ढेर हो जाता है इसलिए व्यक्ति को सदा ही अच्छे कार्यों में लिप्त रहना चाहिए।
3. चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह।
जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह।।
भावार्थ – कबीर कहते हैं कि इस दुनिया में सबसे बड़ा शहंशाह वही है जिसे कुछ भी पाने की चाह नहीं है क्योंकि जिस व्यक्ति का मन कुछ भी पाने और खोने से मुक्त हो जाता है, उसका मन सांसारिक मोह से बेपरवाह हो जाता है।
4. यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।।
भावार्थ – कबीर कहते हैं कि मनुष्य का शरीर विष से भरा हुआ होता है। इसके विपरित गुरु के पास अमृत का भंडार होता है। ऐसे में यदि सच्चे गुरु को पाने की खातिर किसी को अपना सिर काटकर भी देना पड़े तो उसे सस्ता सौदा ही समझना चाहिए।
5. सब धरती काजग करू, लेखनी सब वनराज।
सात समुद्र की मसि करूं, गुरु गुण लिखा न जाए।।
भावार्थ – यदि इस सम्पूर्ण धरती को कागज की भांति बना लिया जाए और समस्त वृक्षों की कलम बना ली जाए। साथ ही सातों समुद्रों को स्याही बनाकर लिखा जाए तब भी गुरु के गुणों का व्याख्यान नहीं किया जा सकता है।
6. ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोए।
औरन को शीतल करे, आपहूं शीतल होय।।
भावार्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य को ऐसी वाणी का प्रयोग करना चाहिए जिससे सुनने वाले के मन को भी शांति मिले। इस प्रकार सौम्य भाषा के आधार पर व्यक्ति सामने वाले व्यक्ति को खुश रख सकता है।
7. बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर।।
भावार्थ – जिस प्रकार से खजूर का पेड़ बड़ा तो होता है लेकिन वह ना तो किसी को फल देता है और ना ही छाया। ठीक उसी प्रकार से यदि आप पद और प्रतिष्ठा में बड़े है लेकिन किसी का भला नहीं कर पा रहे हैं तो आपके बड़पन्न का कोई फायदा नहीं है।
8. निंदक नियेरे राखिए, आंगन कुटी छावायें।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए।।
भावार्थ – कबीर दास जी कहते हैं कि व्यक्ति को यदि अपने व्यवहार में शीतलता लानी है तो उसे ऐसे व्यक्ति को अपने जीवन में पनाह देनी चाहिए जो आपकी गलतियां आपके सामने लाकर रख सके।
9. बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय।।
भावार्थ – कबीर कहते हैं कि मैं जीवन भर दूसरों की गलतियां देखता रहा लेकिन जब मैंने स्वयं के भीतर झांककर देखा तो मुझे खुद से बुरा कोई नहीं मिला। ठीक उसी प्रकार से मनुष्य द्वारा दूसरों में गलतियां खोजने से बेहतर है स्वयं का आत्म चिंतन करना।
10. दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय।।
भावार्थ – व्यक्ति दुख के समय ही ईश्वर को याद करता है और सुख के दिनों में वह ईश्वर को भुला देता है। ऐसे में यदि सुख के दौरान भी व्यक्ति ईश्वर को याद करे तो वह जीवन में कभी दुखी नहीं होगा।
11. माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे।।
भावार्थ – कबीर दास कहते हैं कि जिस प्रकार एक कुम्हार बर्तन बनाने के लिए मिट्टी को रौंदता है। फिर जीवन के अंतिम समय में वह स्वयं उसी मिट्टी में विलीन हो जाता है और वही मिट्ठी उसे रौंदती है।
kabir das ji ke dohe arth sahit
1. गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय।।
भावार्थ – इस संसार में गुरु ही ईश्वर प्राप्ति का एकमात्र सहारा है। इसलिए हमें जब ईश्वर और गुरु दोनों में से किसी एक के चरण स्पर्श करने को कहा जाए तो हमें सबसे पहले गुरु के चरण स्पर्श करने चाहिए क्योंकि गुरु के आशीर्वाद से ही हमें ईश्वर की प्राप्ति होती है।
2. काहैं कबीर देय तू, जब लग तेरी देह।
देह खेह होय जायगी, कौन कहेगा देह।।
भावार्थ – कबीरदास जी कहते है कि जब तक मनुष्य के शरीर में आत्मा का वास है उसे तब तक अच्छे कार्य करते रहना चाहिए। एक बार जब मनुष्य के शरीर से आत्मा निकल जाती है तो उसका शरीर मिट्ठी का ढेर हो जाता है इसलिए व्यक्ति को सदा ही अच्छे कार्यों में लिप्त रहना चाहिए।
3. चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह।
जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह।।
भावार्थ – कबीर कहते हैं कि इस दुनिया में सबसे बड़ा शहंशाह वही है जिसे कुछ भी पाने की चाह नहीं है क्योंकि जिस व्यक्ति का मन कुछ भी पाने और खोने से मुक्त हो जाता है, उसका मन सांसारिक मोह से बेपरवाह हो जाता है।
4. यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।।
भावार्थ – कबीर कहते हैं कि मनुष्य का शरीर विष से भरा हुआ होता है। इसके विपरित गुरु के पास अमृत का भंडार होता है। ऐसे में यदि सच्चे गुरु को पाने की खातिर किसी को अपना सिर काटकर भी देना पड़े तो उसे सस्ता सौदा ही समझना चाहिए।
5. सब धरती काजग करू, लेखनी सब वनराज।
सात समुद्र की मसि करूं, गुरु गुण लिखा न जाए।।
भावार्थ – यदि इस सम्पूर्ण धरती को कागज की भांति बना लिया जाए और समस्त वृक्षों की कलम बना ली जाए। साथ ही सातों समुद्रों को स्याही बनाकर लिखा जाए तब भी गुरु के गुणों का व्याख्यान नहीं किया जा सकता है।
6. ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोए।
औरन को शीतल करे, आपहूं शीतल होय।।
भावार्थ – कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य को ऐसी वाणी का प्रयोग करना चाहिए जिससे सुनने वाले के मन को भी शांति मिले। इस प्रकार सौम्य भाषा के आधार पर व्यक्ति सामने वाले व्यक्ति को खुश रख सकता है।
7. बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर।।
भावार्थ – जिस प्रकार से खजूर का पेड़ बड़ा तो होता है लेकिन वह ना तो किसी को फल देता है और ना ही छाया। ठीक उसी प्रकार से यदि आप पद और प्रतिष्ठा में बड़े है लेकिन किसी का भला नहीं कर पा रहे हैं तो आपके बड़पन्न का कोई फायदा नहीं है।
8. निंदक नियेरे राखिए, आंगन कुटी छावायें।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए।।
भावार्थ – कबीर दास जी कहते हैं कि व्यक्ति को यदि अपने व्यवहार में शीतलता लानी है तो उसे ऐसे व्यक्ति को अपने जीवन में पनाह देनी चाहिए जो आपकी गलतियां आपके सामने लाकर रख सके।
9. बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय।।
भावार्थ – कबीर कहते हैं कि मैं जीवन भर दूसरों की गलतियां देखता रहा लेकिन जब मैंने स्वयं के भीतर झांककर देखा तो मुझे खुद से बुरा कोई नहीं मिला। ठीक उसी प्रकार से मनुष्य द्वारा दूसरों में गलतियां खोजने से बेहतर है स्वयं का आत्म चिंतन करना।
10. दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय।।
भावार्थ – व्यक्ति दुख के समय ही ईश्वर को याद करता है और सुख के दिनों में वह ईश्वर को भुला देता है। ऐसे में यदि सुख के दौरान भी व्यक्ति ईश्वर को याद करे तो वह जीवन में कभी दुखी नहीं होगा।
11. माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे।।
भावार्थ – कबीर दास कहते हैं कि जिस प्रकार एक कुम्हार बर्तन बनाने के लिए मिट्टी को रौंदता है। फिर जीवन के अंतिम समय में वह स्वयं उसी मिट्टी में विलीन हो जाता है और वही मिट्ठी उसे रौंदती है।
kabir das ji ke dohe arth sahit
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solved
5
Telecom
4 years ago
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